A bald man took a seat in a beauty shop.
`How can I help you?` asked the stylist.
`Listen lady, I`m a rich man but I haven`t been able to solve my balding problem,` the guy explained, `I went for a hair transplant but I couldn`t stand the pain. If you can make my hair look like yours without causing me any discomfort, I`ll pay you Rs. 1,00,000.`
`No problem,` said the stylist, and she quickly shaved her head.
Welcome
MAY PEACE BE UPON YOU
3/09/2010
wife and husband
There was once a wife so jealous that when her husband came home one night and she couldn't find hairs on his jackets she yelled at him, "Great, so now you're cheating on me with a bald woman!"
The next night, when she didn't smell any perfume, she yelled again by saying, "She's not only bald, but she's too cheap to buy any perfume!"
The next night, when she didn't smell any perfume, she yelled again by saying, "She's not only bald, but she's too cheap to buy any perfume!"
2/01/2010
बलि-बलि जाऊँ
भारत पै सैयाँ मैं बलि-बलि जाऊँ
बलि-बलि जाऊँ हियरा लगाऊँ
हरवा बनाऊँ घरवा सजाऊँ
मेरे जियरवा का, तन का, जिगरवा का
मन का, मँदिरवा का प्यारा बसैया
मैं बलि-बलि जाऊँ
भारत पै सैयाँ मैं बलि-बलि जाऊँ
भोली-भोली बतियाँ, साँवली सुरतिया
काली-काली ज़ुल्फ़ोंवाली मोहनी मुरतिया
मेरे नगरवा का, मेरे डगरवा का
मेरे अँगनवा का, क्वारा कन्हैया
मैं बलि-बलि जाऊँ
भारत पै सैयाँ मैं बलि-बलि जाऊँ
रचनाकार: श्रीधर पाठक
बलि-बलि जाऊँ हियरा लगाऊँ
हरवा बनाऊँ घरवा सजाऊँ
मेरे जियरवा का, तन का, जिगरवा का
मन का, मँदिरवा का प्यारा बसैया
मैं बलि-बलि जाऊँ
भारत पै सैयाँ मैं बलि-बलि जाऊँ
भोली-भोली बतियाँ, साँवली सुरतिया
काली-काली ज़ुल्फ़ोंवाली मोहनी मुरतिया
मेरे नगरवा का, मेरे डगरवा का
मेरे अँगनवा का, क्वारा कन्हैया
मैं बलि-बलि जाऊँ
भारत पै सैयाँ मैं बलि-बलि जाऊँ
रचनाकार: श्रीधर पाठक
1/13/2010
पगली - गोद भर गई है जिसकी पर मांग अभी तक खाली है
ऊपर वाले तेरी दुनिया कितनी अजब निराली है
कोई समेट नहीं पाता है किसी का दामन खाली है
एक कहानी तुम्हें सुनाऊँ एक किस्मत की हेठी का
न ये किस्सा धन दौलत का न ये किस्सा रोटी का
साधारण से घर में जन्मी लाड़ प्यार में पली बढ़ी थी
अभी-अभी दहलीज पे आ के यौवन की वो खड़ी हुई थी
वो कालेज में पढ़ने जाती थी कुछ-कुछ सकुचाई सी
कुछ इठलाती कुछ बल खाती और कुछ-कुछ शरमाई सी
प्रेम जाल में फँस के एक दिन वो लड़की पामाल हो गई
लूट लिया सब कुछ प्रेमी ने आखिर में कंगाल हो गई
पहले प्रेमी ने ठुकराया फिर घर वाले भी रूठ गए
वो लड़की पागल-सी हो गई सारे रिश्ते टूट गए
अभी-अभी वो पागल लड़की नए शहर में आई है
उसका साथी कोई नहीं है बस केवल परछाई है
उलझ- उलझे बाल हैं उसके सूरत अजब निराली-सी
पर दिखने में लगती है बिलकुल भोली-भाली-सी
झाडू लिए हाथ में अपने सड़कें रोज बुहारा करती
हर आने जाने वाले को हँसते हुए निहारा करती
कभी ज़ोर से रोने लगती कभी गीत वो गाती है
कभी ज़ोर से हँसने लगती और कभी चिल्लाती है
कपड़े फटे हुए हैं उसके जिनसे यौवन झाँक रहा है
केवल एक साड़ी का टुकड़ा खुले बदन को ढाँक रहा है
भूख की मारी वो बेचारी एक होटल पर खड़ी हुई है
आखिर कोई तो कुछ देगा इसी बात पे अड़ी हुई है
गली-मोहल्ले में वो भटकी चौखट-चौखट पर चिल्लाई
लेकिन उसके मन की पीड़ा कहीं किसी को रास न आई
उसको रोटी नहीं मिली है कूड़ेदान में खोज रही है
कैसे उसकी भूख मिटेगी मेरी कलम भी सोच रही है
दिल कहता है कल पूछूंगा किस माँ-बाप की बेटी है
जाने कब से सोई नहीं है जाने कब से भूखी है
ज़ुर्म बताओ पहले उसका जिसकी सज़ा वो झेल रही है
गर्मी-सर्दी और बारिश में तूफानों से खेल रही है
शहर के बाहर पेड़ के नीचे उसका रैन बसेरा है
वही रात कटती है उसकी होता वही सवेरा है
रात गए उसकी चीखों ने सन्नाटे को तोड़ा है
जाने कब तक कुछ गुंडों ने उसका ज़िस्म निचोड़ा है
पुलिस तलाश रही है उनको जिनने ये कुकर्म किया है
आज चिकित्सालय में उसने एक बच्चे को जन्म दिया है
कहते हैं तू कण-कण में है तुझको तो सब कुछ दिखता है
हे ईश्वर क्या तू नारी की ऐसी भी क़िस्मत लिखता है
उस पगली की क़िस्मत तूने ये कैसी लिख डाली है
गोद भर गई है उसकी पर मांग अभी तक खाली है
रचनाकार: जगदीश तपिश
कोई समेट नहीं पाता है किसी का दामन खाली है
एक कहानी तुम्हें सुनाऊँ एक किस्मत की हेठी का
न ये किस्सा धन दौलत का न ये किस्सा रोटी का
साधारण से घर में जन्मी लाड़ प्यार में पली बढ़ी थी
अभी-अभी दहलीज पे आ के यौवन की वो खड़ी हुई थी
वो कालेज में पढ़ने जाती थी कुछ-कुछ सकुचाई सी
कुछ इठलाती कुछ बल खाती और कुछ-कुछ शरमाई सी
प्रेम जाल में फँस के एक दिन वो लड़की पामाल हो गई
लूट लिया सब कुछ प्रेमी ने आखिर में कंगाल हो गई
पहले प्रेमी ने ठुकराया फिर घर वाले भी रूठ गए
वो लड़की पागल-सी हो गई सारे रिश्ते टूट गए
अभी-अभी वो पागल लड़की नए शहर में आई है
उसका साथी कोई नहीं है बस केवल परछाई है
उलझ- उलझे बाल हैं उसके सूरत अजब निराली-सी
पर दिखने में लगती है बिलकुल भोली-भाली-सी
झाडू लिए हाथ में अपने सड़कें रोज बुहारा करती
हर आने जाने वाले को हँसते हुए निहारा करती
कभी ज़ोर से रोने लगती कभी गीत वो गाती है
कभी ज़ोर से हँसने लगती और कभी चिल्लाती है
कपड़े फटे हुए हैं उसके जिनसे यौवन झाँक रहा है
केवल एक साड़ी का टुकड़ा खुले बदन को ढाँक रहा है
भूख की मारी वो बेचारी एक होटल पर खड़ी हुई है
आखिर कोई तो कुछ देगा इसी बात पे अड़ी हुई है
गली-मोहल्ले में वो भटकी चौखट-चौखट पर चिल्लाई
लेकिन उसके मन की पीड़ा कहीं किसी को रास न आई
उसको रोटी नहीं मिली है कूड़ेदान में खोज रही है
कैसे उसकी भूख मिटेगी मेरी कलम भी सोच रही है
दिल कहता है कल पूछूंगा किस माँ-बाप की बेटी है
जाने कब से सोई नहीं है जाने कब से भूखी है
ज़ुर्म बताओ पहले उसका जिसकी सज़ा वो झेल रही है
गर्मी-सर्दी और बारिश में तूफानों से खेल रही है
शहर के बाहर पेड़ के नीचे उसका रैन बसेरा है
वही रात कटती है उसकी होता वही सवेरा है
रात गए उसकी चीखों ने सन्नाटे को तोड़ा है
जाने कब तक कुछ गुंडों ने उसका ज़िस्म निचोड़ा है
पुलिस तलाश रही है उनको जिनने ये कुकर्म किया है
आज चिकित्सालय में उसने एक बच्चे को जन्म दिया है
कहते हैं तू कण-कण में है तुझको तो सब कुछ दिखता है
हे ईश्वर क्या तू नारी की ऐसी भी क़िस्मत लिखता है
उस पगली की क़िस्मत तूने ये कैसी लिख डाली है
गोद भर गई है उसकी पर मांग अभी तक खाली है
रचनाकार: जगदीश तपिश
12/31/2009
उस को यह नया साल मुबारक
आमद पे नए साल की सर जोड़ के बैठें
कर्तब्य हमारा है क्या? कुछ देर यह सोचें
पुर्खों ने हमारे था किया जान क्यों कुर्बान
थे भीड़ गए अँगरेज़ से हिन्दू कि मुसलमान
था ख्वाब कि भारत के मुकद्दर को बदल दें
आज़ाद कराएँ उसे, ख़ुशहाल भी कर दें
जिस देश का इक स्वप्न सजाया था उन्हों ने
ग़ुरबत थी न उस में, न हर रोज़ के दंगे
वह ऐसा था भारत जहाँ हर एक था भाई
दुःख सुख में सभी साथ थे सिख हूँ कि ईसाई
मज़हब की बिना पर न वहाँ लोग झगड़ते
सरहद के लिए, भाषा पे आपस में न लड़ते
अफ़सोस! कि आज वह भारत न यहाँ है
इस देश में छाया हुआ जंगल का समां है
मस्जिद को कहीं कोई गिराने में लगा है
बम फोड़ के लोगों को डराने में लगा है
होते यहाँ मंदिर पे, कभी चर्च पे हमले
गुजरात में वह खून की होली नहीं भूले
हैं ऊंच ब्राह्मण अब भी, नीच दलित हैं
हम सभ्य हैं, लेकिन छुआछूत बहुत है
देखो इसे भाई को ही आतंकी कहे है
कल दोस्त था जो, आज वही शत्रु बने है
आपस में छिड़ा युद्ध यह देखा नहीं जाता
हम रोकते इस को, जो कोइ साथ में आता
बस मेरा चले सब को गले जा के लगाऊँ
जो आग है नफरत की उसे जा के बुझाऊँ
आवाज़ यह हामिद की कोई काश कि सुन ले
थे छोड़ ग़लत काम, इरादों को वह बदले
इस देश की ख़ातिर वह कुछ कर के दिखाए
इस के लिए वह माल भी जां अपनी लगाये
मिल जुल के रहें लोग यही उस की हो ख्वाहिश
वह लाभ दे सब को, है करे जैसे कि बारिश
जो ऐसा हो उस को यह नया साल मुबारक
उस को यह दहा, उस के खेयालात मुबारक
कर्तब्य हमारा है क्या? कुछ देर यह सोचें
पुर्खों ने हमारे था किया जान क्यों कुर्बान
थे भीड़ गए अँगरेज़ से हिन्दू कि मुसलमान
था ख्वाब कि भारत के मुकद्दर को बदल दें
आज़ाद कराएँ उसे, ख़ुशहाल भी कर दें
जिस देश का इक स्वप्न सजाया था उन्हों ने
ग़ुरबत थी न उस में, न हर रोज़ के दंगे
वह ऐसा था भारत जहाँ हर एक था भाई
दुःख सुख में सभी साथ थे सिख हूँ कि ईसाई
मज़हब की बिना पर न वहाँ लोग झगड़ते
सरहद के लिए, भाषा पे आपस में न लड़ते
अफ़सोस! कि आज वह भारत न यहाँ है
इस देश में छाया हुआ जंगल का समां है
मस्जिद को कहीं कोई गिराने में लगा है
बम फोड़ के लोगों को डराने में लगा है
होते यहाँ मंदिर पे, कभी चर्च पे हमले
गुजरात में वह खून की होली नहीं भूले
हैं ऊंच ब्राह्मण अब भी, नीच दलित हैं
हम सभ्य हैं, लेकिन छुआछूत बहुत है
देखो इसे भाई को ही आतंकी कहे है
कल दोस्त था जो, आज वही शत्रु बने है
आपस में छिड़ा युद्ध यह देखा नहीं जाता
हम रोकते इस को, जो कोइ साथ में आता
बस मेरा चले सब को गले जा के लगाऊँ
जो आग है नफरत की उसे जा के बुझाऊँ
आवाज़ यह हामिद की कोई काश कि सुन ले
थे छोड़ ग़लत काम, इरादों को वह बदले
इस देश की ख़ातिर वह कुछ कर के दिखाए
इस के लिए वह माल भी जां अपनी लगाये
मिल जुल के रहें लोग यही उस की हो ख्वाहिश
वह लाभ दे सब को, है करे जैसे कि बारिश
जो ऐसा हो उस को यह नया साल मुबारक
उस को यह दहा, उस के खेयालात मुबारक
12/27/2009
पहले की तरह
पहुँच अचानक उस ने मेरे घर पर
लाड़ भरे स्वर में कहा ठहर कर
"अरे... सब-कुछ पहले जैसा है
सब वैसा का वैसा है...
पहले की तरह..."
फिर शांत नज़र से उस ने मुझे घूरा
लेकिन कहीं कुछ रह गया अधूरा
उदास नज़र से मैं ने उसे ताका
फिर उस की आँखों में झाँका
मुस्काई वह, फिर चहकी चिड़िया-सी
हँसी ज़ोर से किसी बहकी गुड़िया-सी
चूमा उस ने मुझे, फिर सिर को दिया खम
बरसों के बाद इस तरह मिले हम
पहले की तरह
रचनाकार: अनिल जनविजय
कविता कोश
लाड़ भरे स्वर में कहा ठहर कर
"अरे... सब-कुछ पहले जैसा है
सब वैसा का वैसा है...
पहले की तरह..."
फिर शांत नज़र से उस ने मुझे घूरा
लेकिन कहीं कुछ रह गया अधूरा
उदास नज़र से मैं ने उसे ताका
फिर उस की आँखों में झाँका
मुस्काई वह, फिर चहकी चिड़िया-सी
हँसी ज़ोर से किसी बहकी गुड़िया-सी
चूमा उस ने मुझे, फिर सिर को दिया खम
बरसों के बाद इस तरह मिले हम
पहले की तरह
रचनाकार: अनिल जनविजय
कविता कोश
अब वह मेरी पत्नी है
एक दोस्त दुसरे से: यार उस लड़की का हाल तो बताओ जिस के साथ तुम हर दिन टहला करते थे.
दूसरा दोस्त: मेरे और उस के सम्बन्ध बहुत अच्छे थे. एक दिन मैं ने उस से ग़ुस्से में कह दिया कि " मैं तुम से मुहब्बत वहब्बत नहीं करता हूँ. में तो तुम्हें धोका दे रहा था." यह सुन कर वह ग़ुस्से से लाल हो गई और कांपते हुए बोली, "में तुम्हारी चीटिंग का ऐसा बदला लूं गी कि तुम सारी उम्र रोते रहो गे."
दूसरा दोस्त बेताबी से: तो फिर क्या हुआ? क्या वह बदला लेने में सफल हो गई?
दोस्त: यार मैं समझता हूँ कि वह कामयाब हो गयी है. इस लिये कि अब वह मेरी पत्नी है.
दूसरा दोस्त: मेरे और उस के सम्बन्ध बहुत अच्छे थे. एक दिन मैं ने उस से ग़ुस्से में कह दिया कि " मैं तुम से मुहब्बत वहब्बत नहीं करता हूँ. में तो तुम्हें धोका दे रहा था." यह सुन कर वह ग़ुस्से से लाल हो गई और कांपते हुए बोली, "में तुम्हारी चीटिंग का ऐसा बदला लूं गी कि तुम सारी उम्र रोते रहो गे."
दूसरा दोस्त बेताबी से: तो फिर क्या हुआ? क्या वह बदला लेने में सफल हो गई?
दोस्त: यार मैं समझता हूँ कि वह कामयाब हो गयी है. इस लिये कि अब वह मेरी पत्नी है.
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